श्रावक जीवन के 36 कर्तव्य
 

 

जीवन उत्थान हेतु मार्गनुसारी के 35 गुणों को प्राप्त कर, श्रावक  जीवन के 21 गुणों को जीवन में उतारकर, अब श्रावक जीवन के 36 कर्तव्यों को अपनाने की और आगे बढ़ें।( मार्गानुसारी के 35 गुण व श्रावक के 21गुणों को हम पहले पढ़ चुके हैं। श्रावक जीवन को सुशोभित करने वाले आवश्यक करने योग्य 36 कर्तव्यों का वर्णन श्री मन्नह जिणाणं सज्झाय में किया गया है। यह सज्झाय पौषध व्रतधारी श्रावक- श्राविका गण प्रातःकाल देव वंदन करने के बाद, दोपहर का देववंदन करते समय और पच्चखाण पारते समय बोलते हैं।

 

 1) श्री जिनेश्वर भगवंत की आज्ञा को मानना 2) मिथ्यात्व का त्याग करना 3) सम्यकत्व को धारण करना 4) से 9) छह प्रकार के आवश्यक में  प्रतिदिन उद्यमी होना 10) पर्व तिथि में पौषध करना 11) दान देना 12 )शीयल पालना 13) तप करना 14 )उत्तम भावना रखना 15) स्वाध्याय करना 16) नवकार मंत्र का जाप करना 17) परोपकार करना 18) जयणा का पालन करना 19) जिनेश्वर की पूजा 20) जिनेश्वर की स्तुति 21) गुरु भगवंत की स्तुति 22) साधर्मिक के प्रति वात्सल्य 23) व्यवहार में शुद्धि रखना 24) रथ यात्रा 25 )तीर्थ यात्रा करना 26) शांत रहना 27 )विवेक रखना28) संवर करना 29) भाषा समिति का पालन 30) जीवों के प्रति दया 31) धार्मिक जनों के संसर्ग में रहना 32 )इंद्रियों का दमन करना  33) चारित्र (संयम) ग्रहण करने की भावना रखना 34)श्री  चतुर्विध संघ के प्रति बहुमान भाव 35) पुस्तकें लिखना 36) तीर्थ स्थानों में प्रभावना करनी।

प्रस्तुति :-

जे के संघवी ,

ठाणे,आहोर