वैभवशाली भगवान तिरुपति मन्दिर का इतिहास-
राकेश दुबे / मुंबई
आंध्र प्रदेश में तिरुमाला पर्वत पर स्थित है कल्याणकारी श्री हरि भगवान विष्णु का जगत प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर।
पूरे विश्व मे सनातन आर्य हिंदु धर्म का परचम फहराने वाले इस मंदिर के बारे में जानकर आपको हर्ष होगा कि पूरे विश्व मे इससे बड़ा कोई देवालय नही फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो।
इस महान मानव कल्याणी मन्दिर का निर्माण द्वारिकाधीश के वंशज हिंदु हृदय सम्राट यदुवंशी सम्राटो ने कराया था।
तिरुपति का इतिहास।-
महाभारत के युद्ध के पश्चात आपसी कलह के कारण सभी 108 कुलों के यादव यह वहाँ विस्थापित हुए।
कुछ मिडिल ईस्ट जा बसे तो ज़्यादातर उत्तर पश्चिम में ही रहे तथा 18 कुलों के यादव महाऋषि अगस्त्य के संग दक्षिण जा बसे और कई महान राज्यो को आधारशिला रखी जिनमे - विजयनगर साम्राज्य, होयसल साम्राज्य, देवगिरि साम्राज्य आदि प्रमुख हैं।
उन सभी 18 कुलों के गोत्र आज भी यहां के में मौजूद हैं जिनके नाम कुछ इस प्रकार है- कोनार, मणियानी, वेलिर, वाडियार आदि।
यहाँ आकर बसे इन यदुवंशी को यहाँ के लोग आयर कहकर बुलाते है जो आर्य श्रेष्ठ का अपभ्रंश है।
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तिरुपति का अर्थ है तीनो लोको के स्वामी।
9वी सदी के आसपास तिरुपति में एक छोटा यादव राज्य था जिसके यादव राजा बड़े ही धर्मात्मा थे।
कहा जाता है कि स्वयम भगवान विष्णु ने उनसे प्रसन्न हो उन्हें दर्शन दिए और उनकी मूर्ति की प्रतिष्ठा करने को कहा।
भगवान के आदेशानुसार उस यादव राजा ने पर्वत पर जनकल्याण हेतु भगवान की मूर्ती की स्थापना की जिससे प्रशन्न हो भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि -
" आज से सदियों बाद तुम्हारे प्रतापी यादव कुल में एक शौर्यवान सम्राट जन्म लेगा जो यहाँ वापस इस स्थान का जीर्णोद्धार कर मन्दिर को वैभवशाली बनाएगा और फिर यहाँ हमारे इस मंदिर में एक नई परंपरा की शुरुआत होगी जिसके तहत प्रातःकाल मन्दिर के सर्वप्रथम पट खोल हमारे सर्वप्रथम दर्शन का अधिकार सिर्फ यादव वीरो को होगा और जबतक ये धरती, सूरज, चंद्र रहेंगे तुम्हारे कुल की कीर्ति और ये परम्परा बरकरार रहेगा।"
आशीर्वाद दे भगवान तिरुमाला के सातों पहाड़ो के बीच स्थित इसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए।
भविष्यवाणी अनुसार 11वी सदी में आंध्र से कुछ दूर आज के कर्नाटक राज्य में यादव राजा भुवन देव के प्रतापी पुत्रों सम्राट हरिहर देव और बुक्का देव ने तलवार के दम पर और एक ऋषि संत के आशीर्वाद से अखंड हिन्दू साम्राज्य की आधारशिला रखी जो महान विजयनगर साम्राज्य के नाम से विश्व विख्यात हुआ।
विजयनगर साम्राज्य मध्यकालीन भारत का एकमात्र शक्तिशाली हिन्दू यादव साम्राज्य था और इनके शासको को यादव कुल तिलक भी कहा गया।
विजयनगर का शाब्दिक अर्थ है- 'जीत का शहर'।
अपने इस साहसिक कार्य में उन्हें ऋषि सँत विद्वान माधव विद्यारण्य तथा वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार 'सायण' से प्रेरणा मिली।
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी विपुल शक्ति एवं सम्पदा की प्रतीक थी।
एकमात्र भव्य हिंदु साम्राज्य जिससे सीधी टक्कर लेने का साहस उस समय का कोई मुस्लिम घुसपैठिया नही कर पाया।
सम्राट हिरहर देव की ही पीढ़ी में जन्मे प्रतापी सम्राट नरसिंह देव यादव ।
सम्राट नरसिंह देव को जब उनके राजपुरोहित ने उनके गौरवशाली पूर्वजो और भगवान की भविष्यवाणी की याद दिलाते हुए अपने कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित किया।
इसके पश्चात सम्राट नरिसंह देव तिरुपति की तरफ़ कूच कर मन्दिर का जीर्णोद्धार कर भव्य यज्ञ करवाते हैं जिससे प्रसन्न हो भगवान विष्णु दर्शन दे उनके पूर्वजों की याद दिला आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि-
" तुमने अपने कर्तव्य का पालन कर मानवकल्याण मंदिर का पुनः निर्माण कराया है अतः आज से मन्दिर में हमारे प्रातःकाल की चमत्कारी सर्वप्रथम दर्शन का अधिकार सिर्फ पवित्र यादव कुल के लोगों को होगा और जबतक ये संसार है लोग तुम्हारा और तुम्हारे यादव कुल के यश का बखान करते रहेंगे"।
इतना कह भगवान वही अंतर्ध्यान हो जाते हैं।
सम्राट नरसिंह देव के बाद 12वी सदी में इस सम्राज्य के सबसे शक्तिशाली सम्राट कृष्ण देव राय जन्म लेते हैं और अपने गौरवशाली महान पूर्वजो के पथ पर चल इन्होंने तिरूपति बालाजी मंदिर को वैभवशाली बनाया और मन्दिर के शिखर को विशुद्ध स्वर्ण से निर्मित करवाया।
ये साम्राज्य मध्यकाल का स्वर्ण युग था जहाँ गौ बिना कष्ट के विचरण करती,ऋषि, साधु आदि बिना किसी भय के ईश्वर की आराधना, यज्ञ आदि करते।
सम्राट कृष्ण देव के पश्चात यदुराय महाराजा रंगनाथ एवम महाराजा वेंकटेश ने अपने धर्मात्मा पूर्वो के पदचिन्हों पर चलते हुए तिरुपति के समृधि में चार चाँद लगाये तथा इन्होने श्रधालुओं के लिए भगवान तिरुपति के दर्शन एकदम निशुल्क कर दिए।
ये यहाँ हर रोज़ शाही 56 महाभोग और लाखों श्रधालुओं के लिए भंडारे का प्रबंध राजकोष से ही करवाते ।
विजयनगर के विषय में फ़ारसी यात्री 'अब्दुल रज्जाक' ने लिखा है कि,
"विजयनगर दुनिया के सबसे भव्य शहरों में से एक लगा, जो उसने देखे या सुने थे।" इस राज्य की 1565 ई० के तालीकोटा युद्ध में भारी पराजय हुई और राजधानी विजयनगर को नीच मुसलमानों ने जला दिया गया। उसके पश्चात क्षीण रूप में यह और 80 वर्ष चला। राजधानी विजयनगर के अवशेष आधुनिक कर्नाटक राज्य में हम्पी शहर के निकट पाये गये हैं और यह एक विश्व विरासत स्थल है। पुरातात्त्विक खोज से इस साम्राज्य की शक्ति तथा धन-सम्पदा का पता चलता है।
आज सदियाँ बीत गयीं और आज भी अपने शौर्यवान पूर्वजो की तरह यादवो की भगवान तिरुपति पर अटूट श्रद्धा है।
परम्परा के अनुसार आज हज़ारों वर्ष बाद भी तिरुपति में प्रातःकाल मन्दिर का पट खोल भगवान के सर्वप्रथम दर्शन की परम्परा आज भी यहाँ के यदुवंशी अहीरों द्वारा निभाई जाती है।